उत्तराखंड भू-कानून : यदि भूमि, जंगल और जल स्रोत सुरक्षित हैं, तो हम सुरक्षित हैं ।

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भारतीय राजनीति में जब भी किसी राज्य में चुनाव का समय आता है, तो कुछ ऐसे मुद्दे जिनकी आवश्यकता महसूस होने लगती है वह उठने लगते हैं।

वैसे तो उत्तराखंड एक ऐसा राज्य जहां जमीनी मुद्दे बहुत से हैं जैसे पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा। लेकिन जिस प्रकार से उत्तराखंड मैं ज़मीनी लेन-देन चल रहा, उसे देख कर लगता है ही इसे राजनीति से ऊपर उठके देखा जाए तो,उत्तराखंड भू-कानून आवश्यकता महसूस होती है ।

क्या है उत्तराखंड भूकानून?

इसकी शुरुआत होती है साल 2000 में जब उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग कर अलग संस्कृति, बोली-भाषा होने के दम पर एक संपूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया था । उस समय कई आंदोलनकारियों समेत प्रदेश के बुद्धिजीवियों को डर था कि प्रदेश की जमीन और संस्कृति भू माफियाओं के हाथ में न चली जाए. इसलिए सरकार से एक भू-कानून की मांग की गई । इस कानून के आ जाने से कोई भी बाहरी जमीन नहीं खरीद सकता

अखिर क्यों चाहिये ये कानून?

 दरअसल उत्तराखंड जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य में फिलहाल कोई भी सख्त भू-कानून लागू नहीं है. इसका सीधा मतलब है कि यहां आकर कोई भी कितनी भी जमीन अपने नाम से खरीद सकता है. पहाड़ी राज्यों में सस्ते दामों पर जमीन खरीदकर उसे बाहरी लोग अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं ।

इतनी देर क्यों ?

क्या उत्तराखंड में पिछले 21 साल से कोई भी भू कानून लागू नहीं है? जी नहीं, उत्तराखंड का जब गठन हुआ था तो यहां भू कानून भी लागू था, हालांकि ये इतना सख्त नहीं था। राज्य बनने के बाद पहले दो साल तक बाहरी लोग यहां 500 वर्ग मीटर तक जमीन खरीद सकते थे। लेकिन जब 2007 में भुवन चंद्र खंडूरी सीएम बने तो उन्होंने इसे घटाकर 250 वर्गमीटर कर दिया. इस फैसले का लोगों ने स्वागत किया।

वर्ष 2002 में, नवगठित राज्य के लोगों ने राज्य में भूमि कानूनों के बारे में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्वर्गीय एनडी तिवारी को अपनी चिंता व्यक्त की थी। 2003 में, ‘उत्तरांचल (यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम 1950 – अनुकूलन और निगमन) संशोधन अध्यादेश 2003’, दिनांक 12 सितंबर, 2003 में लाया गया था, जिसमें बाहरी लोगों को 500 वर्ग मीटर (वर्ग मीटर) से अधिक कृषि भूमि खरीदने से रोका गया था। उत्तराखंड।

2007 में, भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तहत, मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने राज्य में बाहरी लोगों द्वारा खरीदी जा सकने वाली भूमि का क्षेत्रफल घटाकर 250 वर्ग मीटर कर दिया। हालाँकि, ये प्रतिबंध शहरी क्षेत्रों पर लागू नहीं हुए। एक दशक बाद, 2017 में, उत्तराखंड के लोगों ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी में मतदान किया और त्रिवेंद्र रावत ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। अगले वर्ष, 2018 में, रावत ने 2003 के संशोधन को खारिज कर दिया, जिससे बाहरी लोगों के लिए पहाड़ी राज्य में किसी भी राशि की जमीन खरीदने का मार्ग प्रशस्त हो गया। कृषि भूमि खरीदी जा सकती है और किसी भी गैर-कृषि उपयोग के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। राज्य सरकार का दावा है कि इससे निवेश आकर्षित होगा और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। लेकिन इस कदम से राज्य की आबादी में काफी नाराजगी है।

भूमि कानून के माध्यम से लोगों को शक्ति

राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का नौ प्रतिशत कृषि भूमि है जिसे संरक्षण की आवश्यकता है। साथ ही, राज्य के लोगों का शेष निन्यानबे प्रतिशत भूमि पर अधिकार है। पहाड़ी राज्य का 72 प्रतिशत क्षेत्र वन भूमि था। हमें वन अधिकार कानून को सख्ती से लागू करने की भी आवश्यकता है। एक बार ऐसा करने के बाद, यह स्वचालित रूप से भूमि अधिनियम को सशक्त बना देगा। हमें भूमि कानूनों को मजबूत करने के लिए कुछ करना होगा। मौजूदा कानून केवल भू-माफियाओं को प्रोत्साहित करते हैं।

आखिर लोग क्या चाहते हैं?

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में भूमि देवता का महत्व प्राचीन काल का है। यहाँ के लोग अपनी भूमि को एक भूमि देवता मानते हैं, वह उसकी पूजा करते हैं, साल में होने वाली पहली फसल को सबसे पहले भूमिया देवता को ही चढ़ाया जाता है वह उसके बाद उस फसल का उपयोग किया जाता हे ।

उत्तराखंड के लोगों की मांग है कि उन्हें हिमाचल जैसा भू कानून चाहिए. हिमाचल प्रदेश में एक सख्त भू कानून है, यहां गैर हिमाचली जमीन नहीं खरीद सकता है. यानी बाहरी लोगों की घुसपैठ पर पूरी तरह से रोक है ।

युवा चाहते हैं कि उत्तराखंड सरकार पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश की तरह मजबूत कानून लाए, जहां 1971 से कृषि भूमि का व्यापार करना असंभव है। हिमाचल प्रदेश काश्तकारी और भूमि सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के अनुसार कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग के लिए बेचा नहीं जा सकता है। साथ ही, कोई भी गैर-हिमाचली व्यक्ति राज्य में जमीन नहीं खरीद सकता है, हालांकि वह वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए जमीन किराए पर ले सकता है।